दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से 5 दिवसीय श्रीराम कथामृत का हुआ शुभारंभ

5 day Shri Ram Kathamrit inaugurated by Divya Jyoti Jagrati Sansthan
 
 
प्रथम दिन उपायुक्त आरके सिंह ने किया कथा में द्वीप प्रज्वलित
 
सिरसा। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से नेहरू पार्क स्थित रामलीला ग्राउंड में पांच दिवसीय कथामृत का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिन उपायुक्त आरके सिंह ने द्वीप प्रज्वलित कर कथा का शुभारंभ किया। पांच दिवसीय कथा का वाचन आशुतोष महाराज की शिष्य त्रिपदा भारती कर रही हैं। कथावाचक ने कहा कि प्रभु श्री राम का चरित्र विश्व संस्कृति में एक उज्जवल एवं सर्वत्र परिव्याप्त वर्णातीत सत तत्व है। भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता में राम कथा का विशिष्ठ स्थान है। रामजी के बिना भारतीयता का अस्तित्व एवं उसकी पहचान भी संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि हमारे जीवन का आधार प्रभु श्री राम है, लेकिन उन्हें हम अपनी बुद्धि के द्वारा कभी समझ ही नहीं सकते। शास्त्र कहते हैं राम अतक्र्य बुद्धि मन वाणी बुद्धि की एक सीमा होती है और सीमित बुद्धि से असीम को पाया नहीं जा सकता। जहां बुद्धि की सीमा समाप्त होती है, वहीं से ज्ञान का प्रारंभ होता है। उन्होंने माता सती के प्रसंग के माध्यम से समझाया कि सती बुद्धि से इन्द्रियों से राम जी की लीला और उनके रहस्य को समझना चाहती थी, पर नाकामयाब हुई। ठीक इसी प्रकार मन बुद्धि से हम अध्यात्म को समझ नहीं सकते, क्योंकि अध्यात्म का अर्थ होता है आत्मा का अध्ययन आत्मानुभूति। जो केवल एक गुरु की कृपा से ही हम कर सकते हैं। मात्र एक पूर्ण गुरु ही हमें संशयों से निकाल कर अध्यात्म की डगर पर ले चलते हैं। कथा में संत समाज द्वारा सुमधुर भजनों एवं चौपाइयों का गायन भी किया गया। कथा के बाद सभी श्रद्धालुओं ने भंडारे का प्रसाद भी ग्रहण किया। इस मौके पर जगदीश बांसल, समाजेसवी अनिल बजाज, अजय कुमार डिंग वाले, डा. धर्मपाल, सुरेंद्र तायल व विरेंद्र गुप्ता ने यजमान की भूमिका निभाई।
संस्थान से बहुत पुराना जुड़ा हुआ हूं: आरके सिंह
उपायुक्त आरके सिंह ने कहा कि हम सभी भाग्यशाली हैं कि ऐसे आयोजनों में हिस्सा बनने का मौका मिलता है। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान में कुरूक्षेत्र में कई बार जाना हुआ और परिवार सदस्य भी जुड़े हैं। संस्थान की ओर से जो कार्ड बनाया गया है, वो बहुत आकर्षित है। जिसे पढक़र मुझे बहुत अच्छा लगा। हम चाहे किसी भी पद पर पहुंच जाए, लेकिन भारतीय संस्कृति हम सबके अंदर जीवित रहती है। संस्थान की ओर से महायोगी का महारहस्य मैंने पढ़ी है और अपने पुस्तकालय में भी रखी हुई है।